॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.14.4
मैत्रेय उवाच
साधु वीर त्वया पृष्टमवतारकथां हरेः।
यत्त्वं पृच्छसि मर्त्यानां मृत्युपाशविशातनीम्॥ ४
sādhu vīra tvayā pṛṣṭamavatārakathāṃ hareḥ|
yattvaṃ pṛcchasi martyānāṃ mṛtyupāśaviśātanīm|| 4
अर्थ
श्रीमैत्रेयजीने कहा—विदुरजी! तुम्हारा प्रश्न बड़ा ही सुन्दर है; क्योंकि तुम श्रीहरिकी अवतारकथाके विषयमें ही पूछ रहे हो, जो मनुष्योंके मृत्युपाशका छेदन करनेवाली है॥ ४॥ देखो, उत्तानपादका पुत्र ध्रुव बालकपनमें श्रीनारदजीकी सुनायी हुई हरिकथाके प्रभावसे ही मृत्युके सिरपर पैर रखकर भगवान्के परमपदपर आरूढ़ हो गया था॥ ५॥ पूर्वकालमें एक बार इसी वाराहभगवान् और हिरण्याक्षके युद्धके विषयमें देवताओंके प्रश्न करनेपर देवदेव श्रीब्रह्माजीने उन्हें यह इतिहास सुनाया था और उसीको परम्परासे मैंने सुना है॥ ६॥ विदुरजी! एक बार दक्षकी पुत्री दितिने पुत्रप्राप्तिकी इच्छासे कामातुर होकर सायंकालके समय ही अपने पति मरीचिनन्दन कश्यपजीसे प्रार्थना की॥ ७॥ उस समय कश्यपजी खीरकी आहुतियोंद्वारा अग्निजिह्व भगवान् यज्ञपतिकी आराधना कर सूर्यास्तका समय जान अग्निशालामें ध्यानस्थ होकर बैठे थे॥ ८॥ ✎ 1967