श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.14.7

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

दितिर्दाक्षायणी क्षत्तर्मारीचं कश्यपं पतिम्।

अपत्यकामा चकमे सन्ध्यायां हृच्छयार्दिता॥ ७

ditirdākṣāyaṇī kṣattarmārīcaṃ kaśyapaṃ patim|

apatyakāmā cakame sandhyāyāṃ hṛcchayārditā|| 7

अर्थ

विदुरजी! एक बार दक्षकी पुत्री दितिने पुत्रप्राप्तिकी इच्छासे कामातुर होकर सायंकालके समय ही अपने पति मरीचिनन्दन कश्यपजीसे प्रार्थना की॥ ७॥✎ 1967

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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