॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.15.20
यत्सङ्कुलं हरिपदानतिमात्रदृष्टै-
र्वैदूर्यमारकतहेममयैर्विमानैः ।
येषां बृहत्कटितटाः स्मितशोभिमुख्यः
कृष्णात्मनां न रज आदधुरुत्स्मयाद्यैः॥ २०
yatsaṅkulaṃ haripadānatimātradṛṣṭai-
rvaidūryamārakatahemamayairvimānaiḥ |
yeṣāṃ bṛhatkaṭitaṭāḥ smitaśobhimukhyaḥ
kṛṣṇātmanāṃ na raja ādadhurutsmayādyaiḥ|| 20
अर्थ
वह लोक वैदूर्य, मरकतमणि (पन्ने) और सुवर्णके विमानोंसे भरा हुआ है। ये सब किसी कर्मफलसे नहीं, बल्कि एकमात्र श्रीहरिके पादपद्मोंकी वन्दना करनेसे ही प्राप्त होते हैं। उन विमानोंपर चढ़े हुए कृष्णप्राण भगवद्भक्तोंके चित्तोंमें बड़े-बड़े नितम्बोंवाली सुमुखी सुन्दरियाँ भी अपनी मन्द मुसकान एवं मनोहर हास-परिहाससे कामविकार नहीं उत्पन्न कर सकतीं॥ २०॥✎ 1591