श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.21

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

श्री रूपिणी क्‍वणयती चरणारविन्दं

लीलाम्बुजेन हरिसद्मनि मुक्तदोषा।

संलक्ष्यते स्फटिककुड्य उपेतहेम्नि

सम्मार्जतीव यदनुग्रहणेऽन्ययत्नः॥ २१

śrī rūpiṇī kvaṇayatī caraṇāravindaṃ

līlāmbujena harisadmani muktadoṣā|

saṃlakṣyate sphaṭikakuḍya upetahemni

sammārjatīva yadanugrahaṇe'nyayatnaḥ|| 21

अर्थ

परम सौन्दर्यशालिनी लक्ष्मीजी, जिनकी कृपा प्राप्त करनेके लिये देवगण भी यत्नशील रहते हैं, श्रीहरिके भवनमें चंचलतारूप दोषको त्यागकर रहती हैं। जिस समय अपने चरणकमलोंके नूपुरोंकी झनकार करती हुई वे अपना लीलाकमल घुमाती हैं, उस समय उस कनकभवनकी स्फटिकमय दीवारोंमें उनका प्रतिबिम्ब पड़नेसे ऐसा जान पड़ता है मानो वे उन्हें बुहार रही हों॥ २१॥ प्यारे देवताओ! जिस समय दासियोंको साथ लिये वे अपने क्रीडावनमें तुलसीदलद्वारा भगवान्‌का पूजन करती हैं, तब वहाँके निर्मल जलसे भरे हुए सरोवरोंमें, जिनमें मूँगेके घाट बने हुए हैं, अपना सुन्दर अलकावली और उन्‍नत नासिकासे सुशोभित मुखारविन्द देखकर ‘यह भगवान्‌का चुम्बन किया हुआ है’ यों जानकर उसे बड़ा सौभाग्यशाली समझती हैं॥ २२॥ जो लोग भगवान्‌की पापापहारिणी लीलाकथाओंको छोड़कर बुद्धिको नष्ट करनेवाली अर्थ-कामसम्बन्धिनी अन्य निन्दित कथाएँ सुनते हैं, वे उस वैकुण्ठलोकमें नहीं जा सकते। हाय! जब वे अभागे लोग इन सारहीन बातोंको सुनते हैं, तब ये उनके पुण्योंको नष्टकर उन्हें आश्रयहीन घोर नरकोंमें डाल देती हैं॥ २३॥ अहा! इस मनुष्ययोनिकी बड़ी महिमा है, हम देवतालोग भी इसकी चाह करते हैं। इसीमें तत्त्वज्ञान और धर्मकी भी प्राप्ति हो सकती है। इसे पाकर भी जो लोग भगवान्‌की आराधना नहीं करते, वे वास्तवमें उनकी सर्वत्र फैली हुई मायासे ही मोहित हैं॥ २४॥ देवाधिदेव श्रीहरिका निरन्तर चिन्तन करते रहनेके कारण जिनसे यमराज दूर रहते हैं, आपसमें प्रभुके सुयशकी चर्चा चलनेपर अनुरागजन्य विह्वलतावश जिनके नेत्रोंसे अविरल अश्रुधारा बहने लगती है तथा शरीरमें रोमांच हो जाता है और जिनके-से शील स्वभावकी हमलोग भी इच्छा करते हैं—वे परमभागवत ही हमारे लोकोंसे ऊपर उस वैकुण्ठधाममें जाते हैं॥ २५॥ जिस समय सनकादि मुनि विश्‍वगुरु श्रीहरिके निवास-स्थान, सम्पूर्ण लोकोंके वन्दनीय और श्रेष्ठ देवताओंके विचित्र विमानोंसे विभूषित उस परम दिव्य और अद्भुत वैकुण्ठधाममें अपने योगबलसे पहुँचे, तब उन्हें बड़ा ही आनन्द हुआ॥ २६॥ ✎ 261 262 1307 1308

यह व्याख्या श्लोक 3.15.21 से 3.15.26 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #261 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #262 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1307 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वैकुण्ठ-लोकमें → वैकुण्ठलोकमें
  • #1308 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्रति-बिम्ब → प्रतिबिम्ब

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