॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.15.32
मुनय ऊचुः
को वामिहैत्य भगवत्परिचर्ययोच्चै-
स्तद्धर्मिणां४ निवसतां विषमः स्वभावः।
तस्मिन् प्रशान्तपुरुषे गतविग्रहे वां
को वाऽऽत्मवत्कुहकयोः परिशङ्कनीयः॥ ३२
ko vāmihaitya bhagavatparicaryayoccai-
staddharmiṇāṃ nivasatāṃ viṣamaḥ svabhāvaḥ|
tasmin praśāntapuruṣe gatavigrahe vāṃ
ko vā''tmavatkuhakayoḥ pariśaṅkanīyaḥ|| 32
अर्थ
मुनियोंने कहा—अरे द्वारपालो! जो लोग भगवान्की महती सेवाके प्रभावसे इस लोकको प्राप्त होकर यहाँ निवास करते हैं, वे तो भगवान्के समान ही समदर्शी होते हैं। तुम दोनों भी उन्हींमेंसे हो, किन्तु तुम्हारे स्वभावमें यह विषमता क्यों है? भगवान् तो परम शान्तस्वभाव हैं, उनका किसीसे विरोध भी नहीं है; फिर यहाँ ऐसा कौन है, जिसपर शंका की जा सके? तुम स्वयं कपटी हो, इसीसे अपने ही समान दूसरोंपर शंका करते हो ॥ ३२॥✎ 263
टिप्पणियाँ
- ४
प्रा० पा०—तद्धर्मणां।