श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.33

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

न ह्यन्तरं भगवतीह समस्तकुक्षा-

वात्मानमात्मनि नभो नभसीव धीराः।

पश्यन्ति यत्र युवयोः सुरलिङ्गिनोः किं

व्युत्पादितं ह्युदरभेदि भयं यतोऽस्य॥ ३३

na hyantaraṃ bhagavatīha samastakukṣā-

vātmānamātmani nabho nabhasīva dhīrāḥ|

paśyanti yatra yuvayoḥ suraliṅginoḥ kiṃ

vyutpāditaṃ hyudarabhedi bhayaṃ yato'sya|| 33

अर्थ

भगवान्‌के उदरमें यह सारा ब्रह्माण्ड स्थित है; इसलिये यहाँ रहनेवाले ज्ञानीजन सर्वात्मा श्रीहरिसे अपना कोई भेद नहीं देखते, बल्कि महाकाशमें घटाकाशकी भाँति उनमें अपना अन्तर्भाव देखते हैं। तुम तो देवरूपधारी हो; फिर भी तुम्हें ऐसा क्या दिखायी देता है, जिससे तुमने भगवान्‌के साथ कुछ भेदभावके कारण होनेवाले भयकी कल्पना कर ली॥ ३३॥✎ 263

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #263 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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