श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.45

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

पुंसां गतिं मृगयतामिह योगमार्गै-

र्ध्यानास्पदं बहु मतं नयनाभिरामम्।

पौंस्नं वपुर्दर्शयानमनन्यसिद्धै-

रौत्पत्तिकैः समगृणन् युतमष्टभोगैः॥ ४५

puṃsāṃ gatiṃ mṛgayatāmiha yogamārgai-

rdhyānāspadaṃ bahu mataṃ nayanābhirāmam|

pauṃsnaṃ vapurdarśayānamananyasiddhai-

rautpattikaiḥ samagṛṇan yutamaṣṭabhogaiḥ|| 45

अर्थ

इसके पश्चात् वे मुनिगण अन्य साधनोंसे सिद्ध न होनेवाली स्वाभाविक अष्टसिद्धियोंसे सम्पन्‍न श्रीहरिकी स्तुति करने लगे—जो योगमार्गद्वारा मोक्षपदकी खोज करनेवाले पुरुषोंके लिये उनके ध्यानका विषय, अत्यन्त आदरणीय और नयनानन्दकी वृद्धि करनेवाला पुरुषरूप प्रकट करते हैं॥ ४५॥

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