श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.46

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

कुमारा ऊचुः

योऽन्तर्हितो हृदि गतोऽपि दुरात्मनां त्वं

सोऽद्यैव नो नयनमूलमनन्त राद्धः।

यर्ह्येव कर्णविवरेण गुहां गतो नः

पित्रानुवर्णितरहा भवदुद्भवेन॥ ४६

yo'ntarhito hṛdi gato'pi durātmanāṃ tvaṃ

so'dyaiva no nayanamūlamananta rāddhaḥ|

yarhyeva karṇavivareṇa guhāṃ gato naḥ

pitrānuvarṇitarahā bhavadudbhavena|| 46

अर्थ

सनकादि मुनियोंने कहा—अनन्त! यद्यपि आप अन्तर्यामीरूपसे दुष्टचित्त पुरुषोंके हृदयमें भी स्थित रहते हैं, तथापि उनकी दृष्टिसे ओझल ही रहते हैं। किन्तु आज हमारे नेत्रोंके सामने तो आप साक्षात् विराजमान हैं। प्रभो! जिस समय आपसे उत्पन्‍न हुए हमारे पिता ब्रह्माजीने आपका रहस्य वर्णन किया था, उसी समय श्रवणरन्ध्रोंद्वारा हमारी बुद्धिमें तो आप आ विराजे थे; किन्तु प्रत्यक्ष दर्शनका महान् सौभाग्य तो हमें आज ही प्राप्त हुआ है॥ ४६॥

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