श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.50

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

प्रादुश्‍चकर्थ यदिदं पुरुहूत रूपं

तेनेश निर्वृतिमवापुरलं दृशो नः।

तस्मा इदं भगवते नम इद्विधेम

योऽनात्मनां दुरुदयो भगवान् प्रतीतः॥ ५०

prāduścakartha yadidaṃ puruhūta rūpaṃ

teneśa nirvṛtimavāpuralaṃ dṛśo naḥ|

tasmā idaṃ bhagavate nama idvidhema

yo'nātmanāṃ durudayo bhagavān pratītaḥ|| 50

अर्थ

विपुलकीर्ति प्रभो! आपने हमारे सामने जो यह मनोहर रूप प्रकट किया है, उससे हमारे नेत्रोंको बड़ा ही सुख मिला है; विषयासक्त अजितेन्द्रिय पुरुषोंके लिये इसका दृष्टिगोचर होना अत्यन्त कठिन है। आप साक्षात् भगवान् हैं और इस प्रकार स्पष्टतया हमारे नेत्रोंके सामने प्रकट हुए हैं। हम आपको प्रणाम करते हैं॥ ५०॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे जयविजययोः
सनकादिशापो नाम पञ्चदशोऽध्यायः॥ १५॥

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