श्रीब्रह्माजीने कहा—देवगण! जब योगनिष्ठ सनकादि मुनियोंने इस प्रकार स्तुति की, तब वैकुण्ठ-निवास श्रीहरिने उनकी प्रशंसा करते हुए यह कहा॥ १॥✎ 1593
इति तद् गृणतां तेषां मुनीनां योगधर्मिणाम्।
प्रतिनन्द्य जगादेदं विकुण्ठनिलयो विभुः॥ १
श्रीब्रह्माजीने कहा—देवगण! जब योगनिष्ठ सनकादि मुनियोंने इस प्रकार स्तुति की, तब वैकुण्ठ-निवास श्रीहरिने उनकी प्रशंसा करते हुए यह कहा॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.16.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 312) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/16/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)