श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.16.2

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

एतौ तौ पार्षदौ मह्यं जयो विजय एव च।

कदर्थीकृत्य मां यद्वो बह्वक्रातामतिक्रमम्॥ २

etau tau pārṣadau mahyaṃ jayo vijaya eva ca|

kadarthīkṛtya māṃ yadvo bahvakrātāmatikramam|| 2

अर्थ

श्रीभगवान्‌ने कहा—मुनिगण! ये जय-विजय मेरे पार्षद हैं। इन्होंने मेरी कुछ भी परवा न करके आपका बहुत बड़ा अपराध किया है॥ २॥ आपलोग भी मेरे अनुगत भक्त हैं; अतः इस प्रकार मेरी ही अवज्ञा करनेके कारण आपने इन्हें जो दण्ड दिया है, वह मुझे भी अभिमत है॥ ३॥ ब्राह्मण मेरे परम आराध्य हैं; मेरे अनुचरोंके द्वारा आपलोगोंका जो तिरस्कार हुआ है, उसे मैं अपना ही किया हुआ मानता हूँ। इसलिये मैं आपलोगोंसे प्रसन्‍नताकी भिक्षा माँगता हूँ॥ ४॥ सेवकोंके अपराध करनेपर संसार उनके स्वामीका ही नाम लेता है। वह अपयश उसकी कीर्तिको इस प्रकार दूषित कर देता है, जैसे त्वचाको चर्मरोग॥ ५॥ ✎ 265

यह व्याख्या श्लोक 3.16.2 से 3.16.5 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #265 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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