श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.16.22

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

धर्मस्य ते भगवतस्त्रियुग त्रिभिः स्वैः

पद्भिश्‍चराचरमिदं द्विजदेवतार्थम्।

नूनं भृतं तदभिघाति रजस्तमश्‍च

सत्त्वेन नो वरदया तनुवा निरस्य॥ २२

dharmasya te bhagavatastriyuga tribhiḥ svaiḥ

padbhiścarācaramidaṃ dvijadevatārtham|

nūnaṃ bhṛtaṃ tadabhighāti rajastamaśca

sattvena no varadayā tanuvā nirasya|| 22

अर्थ

भगवन्! आप साक्षात् धर्मस्वरूप हैं। आप सत्यादि तीनों युगोंमें प्रत्यक्षरूपसे विद्यमान रहते हैं तथा ब्राह्मण और देवताओंके लिये तप, शौच और दया—अपने इन तीन चरणोंसे इस चराचर जगत‍्की रक्षा करते हैं। अब आप अपनी शुद्धसत्त्वमयी वरदायिनी मूर्तिसे हमारे धर्मविरोधी रजोगुण-तमोगुणको दूर कर दीजिये॥ २२॥

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