श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.16.23

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

न त्वं द्विजोत्तमकुलं यदिहात्मगोपं

गोप्ता वृषः स्वर्हणेन ससूनृतेन।

तर्ह्येव नङ्क्ष्यति शिवस्तव देव पन्था

लोकोऽग्रहीष्यदृषभस्य हि तत्प्रमाणम्॥ २३

na tvaṃ dvijottamakulaṃ yadihātmagopaṃ

goptā vṛṣaḥ svarhaṇena sasūnṛtena|

tarhyeva naṅkṣyati śivastava deva panthā

loko'grahīṣyadṛṣabhasya hi tatpramāṇam|| 23

अर्थ

देव! यह ब्राह्मणकुल आपके द्वारा अवश्य रक्षणीय है। यदि साक्षात् धर्मरूप होकर भी आप सुमधुर वाणी और पूजनादिके द्वारा इस उत्तम कुलकी रक्षा न करें तो आपका निश्चित किया हुआ कल्याणमार्ग ही नष्ट हो जाय; क्योंकि लोक तो श्रेष्ठ पुरुषोंके आचरणको ही प्रमाणरूपसे ग्रहण करता है॥ २३॥

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