श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.16.24

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

तत्तेऽनभीष्टमिव सत्त्वनिधेर्विधित्सोः

क्षेमं जनाय निजशक्तिभिरुद‍्धृतारेः।

नैतावता त्र्यधिपतेर्बत विश्‍वभर्तु-

स्तेजः क्षतं त्ववनतस्य स ते विनोदः॥ २४

tatte'nabhīṣṭamiva sattvanidhervidhitsoḥ

kṣemaṃ janāya nijaśaktibhiruddhṛtāreḥ|

naitāvatā tryadhipaterbata viśvabhartu-

stejaḥ kṣataṃ tvavanatasya sa te vinodaḥ|| 24

अर्थ

प्रभो! आप सत्त्वगुणकी खान हैं और सभी जीवोंका कल्याण करनेके लिये उत्सुक हैं। इसीसे आप अपनी शक्तिरूप राजा आदिके द्वारा धर्मके शत्रुओंका संहार करते हैं; क्योंकि वेदमार्गका उच्छेद आपको अभीष्ट नहीं है। आप त्रिलोकीनाथ और जगत्प्रतिपालक होकर भी ब्राह्मणोंके प्रति इतने नम्र रहते हैं, इससे आपके तेजकी कोई हानि नहीं होती; यह तो आपकी लीलामात्र है॥ २४॥

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