श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.16.28

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

भगवन्तं परिक्रम्य प्रणिपत्यानुमा४न्य च।

प्रतिजग्मुः प्रमुदिताः शंसन्तो वैष्णवीं श्रियम्॥ २८

bhagavantaṃ parikramya praṇipatyānumānya ca|

pratijagmuḥ pramuditāḥ śaṃsanto vaiṣṇavīṃ śriyam|| 28

अर्थ

श्रीब्रह्माजी कहते हैं—तदनन्तर उन मुनीश्‍वरोंने नयनाभिराम भगवान् विष्णु और उनके स्वयंप्रकाश वैकुण्ठधामके दर्शन करके प्रभुकी परिक्रमा की और उन्हें प्रणामकर तथा उनकी आज्ञा पा भगवान्‌के ऐश्‍वर्यका वर्णन करते हुए प्रमुदित हो वहाँसे लौट गये॥ २७-२८॥✎ 270 271

यह अर्थ श्लोक 27–28 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—भाव्य च।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 316)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #270 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #271 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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