श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.16.29

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

भगवाननुगावाह यातं मा भैष्टमस्तु शम्।

ब्रह्मतेजः समर्थोऽपि हन्तुं नेच्छे मतं तु मे॥ २९

bhagavānanugāvāha yātaṃ mā bhaiṣṭamastu śam|

brahmatejaḥ samartho'pi hantuṃ necche mataṃ tu me|| 29

अर्थ

फिर भगवान्‌ने अपने अनुचरोंसे कहा, ‘जाओ, मनमें किसी प्रकारका भय मत करो; तुम्हारा कल्याण होगा। मैं सब कुछ करनेमें समर्थ होकर भी ब्रह्मतेजको मिटाना नहीं चाहता; क्योंकि ऐसा ही मुझे अभिमत भी है॥ २९॥✎ 270 271

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #270 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #271 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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