॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.17.4
सहाचला भुवश्चेलुर्दिशः सर्वाः प्रजज्वलुः।
सोल्काश्चाशनयः पेतुः केतवश्चार्तिहेतवः॥ ४
sahācalā bhuvaścelurdiśaḥ sarvāḥ prajajvaluḥ|
solkāścāśanayaḥ petuḥ ketavaścārtihetavaḥ|| 4
अर्थ
जहाँ-तहाँ पृथ्वी और पर्वत काँपने लगे, सब दिशाओंमें दाह होने लगा। जगह-जगह उल्कापात होने लगा, बिजलियाँ गिरने लगीं और आकाशमें अनिष्टसूचक धूमकेतु (पुच्छल तारे) दिखायी देने लगे॥ ४॥