बार-बार सायँ-सायँ करती और बड़े-बड़े वृक्षोंको उखाड़ती हुई बड़ी विकट और असह्य वायु चलने लगी। उस समय आँधी उसकी सेना और उड़ती हुई धूल ध्वजाके समान जान पड़ती थी॥ ५॥
ववौ वायुः सुदुःस्पर्शः फूत्कारानीरयन्मुहुः।
उन्मूलयन्नगपतीन्वात्यानीको रजोध्वजः॥ ५
बार-बार सायँ-सायँ करती और बड़े-बड़े वृक्षोंको उखाड़ती हुई बड़ी विकट और असह्य वायु चलने लगी। उस समय आँधी उसकी सेना और उड़ती हुई धूल ध्वजाके समान जान पड़ती थी॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.17.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 317) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/17/5/