श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.18.11

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

एते वयं न्यासहरा रसौकसां

गतह्रियो गदया द्रावितास्ते।

तिष्ठामहेऽथापि कथञ्चिदाजौ

स्थेयं क्‍व यामो बलिनोत्पाद्य वैरम्॥ ११

ete vayaṃ nyāsaharā rasaukasāṃ

gatahriyo gadayā drāvitāste|

tiṣṭhāmahe'thāpi kathañcidājau

stheyaṃ kva yāmo balinotpādya vairam|| 11

अर्थ

हाँ, हम रसातलवासियोंकी धरोहर चुराकर और लज्जा छोड़कर तेरी गदाके भयसे यहाँ भाग आये हैं। हममें ऐसी सामर्थ्य ही कहाँ कि तेरे-जैसे अद्वितीय वीरके सामने युद्धमें ठहर सकें। फिर भी हम जैसे-तैसे तेरे सामने खड़े हैं; तुझ-जैसे बलवानोंसे वैर बाँधकर हम जा भी कहाँ सकते हैं?॥ ११॥✎ 275

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #275 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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