तू पैदल वीरोंका सरदार है, इसलिये अब निःशंक होकर—उधेड़-बुन छोड़कर हमारा अनिष्ट करनेका प्रयत्न कर और हमें मारकर अपने भाई-बन्धुओंके आँसू पोंछ। अब इसमें देर न कर। जो अपनी प्रतिज्ञाका पालन नहीं करता, वह असभ्य है—भले आदमियोंमें बैठने लायक नहीं है॥ १२॥✎ 275
त्वं पद्रथानां किल यूथपाधिपो
घटस्व नोऽस्वस्तय आश्वनूहः।
संस्थाप्य चास्मान् प्रमृजाश्रु स्वकानां
यः स्वां प्रतिज्ञां नातिपिपर्त्यसभ्यः॥ १२
तू पैदल वीरोंका सरदार है, इसलिये अब निःशंक होकर—उधेड़-बुन छोड़कर हमारा अनिष्ट करनेका प्रयत्न कर और हमें मारकर अपने भाई-बन्धुओंके आँसू पोंछ। अब इसमें देर न कर। जो अपनी प्रतिज्ञाका पालन नहीं करता, वह असभ्य है—भले आदमियोंमें बैठने लायक नहीं है॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.18.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 322) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/18/12/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#275 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने