श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.18.14

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

सृजन्‍नमर्षितः श्वासान्मन्युप्रचलितेन्द्रियः।

आसाद्य तरसा दैत्यो गदयाभ्यहनद्धरिम्॥ १४

sṛjannamarṣitaḥ śvāsānmanyupracalitendriyaḥ|

āsādya tarasā daityo gadayābhyahanaddharim|| 14

अर्थ

वह खीझकर लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगा, उसकी इन्द्रियाँ क्रोधसे क्षुब्ध हो उठीं और उस दुष्ट दैत्यने बड़े वेगसे लपककर भगवान्‌पर गदाका प्रहार किया॥ १४॥✎ 276 277 278

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #276 शब्दोंके बीचका स्थान: गदाकाप्रहार → गदाका प्रहार
  • #277 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् पर → भगवान्‌पर
  • #278 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें