श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.18.4

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

त्वं नः सपत्नैरभवाय किं भृतो

यो मायया हन्त्यसुरान् परोक्षजित्।

त्वां योगमायाबलमल्पपौरुषं

संस्थाप्य मूढ प्रमृजे सुहृच्छुचः॥ ४

tvaṃ naḥ sapatnairabhavāya kiṃ bhṛto

yo māyayā hantyasurān parokṣajit|

tvāṃ yogamāyābalamalpapauruṣaṃ

saṃsthāpya mūḍha pramṛje suhṛcchucaḥ|| 4

अर्थ

तू मायासे लुक-छिपकर ही दैत्योंको जीत लेता और मार डालता है। क्या इसीसे हमारे शत्रुओंने हमारा नाश करानेके लिये तुझे पाला है? मूढ़! तेरा बल तो योगमाया ही है और कोई पुरुषार्थ तुझमें थोड़े ही है। आज तुझे समाप्तकर मैं अपने बन्धुओंका शोक दूर करूँगा॥ ४॥✎ 272

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #272 शब्दोंके बीचका स्थान: वराहभगवान् को → वराहभगवान्‌को

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