जब मेरे हाथसे छूटी हुई गदाके प्रहारसे सिर फट जानेके कारण तू मर जायगा, तब तेरी आराधना करनेवाले जो देवता और ऋषि हैं, वे सब भी जड़ कटे हुए वृक्षोंकी भाँति स्वयं ही नष्ट हो जायँगे’॥ ५॥✎ 272
त्वयि संस्थिते गदया शीर्णशीर्ष-
ण्यस्मद्भुजच्युतया ये च तुभ्यम्।
बलिं हरन्त्यृषयो ये च देवाः
स्वयं सर्वे न भविष्यन्त्यमूलाः॥ ५
जब मेरे हाथसे छूटी हुई गदाके प्रहारसे सिर फट जानेके कारण तू मर जायगा, तब तेरी आराधना करनेवाले जो देवता और ऋषि हैं, वे सब भी जड़ कटे हुए वृक्षोंकी भाँति स्वयं ही नष्ट हो जायँगे’॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.18.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 321) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/18/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#272 शब्दोंके बीचका स्थान: वराहभगवान् को → वराहभगवान्को