श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.18.8

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

स गामुदस्तात्सलिलस्य गोचरे

विन्यस्य तस्यामदधात्स्वसत्त्वम्।

अभिष्टुतो विश्‍वसृजा प्रसूनै-

रापूर्यमाणो विबुधैः पश्यतोऽरेः॥ ८

sa gāmudastātsalilasya gocare

vinyasya tasyāmadadhātsvasattvam|

abhiṣṭuto viśvasṛjā prasūnai-

rāpūryamāṇo vibudhaiḥ paśyato'reḥ|| 8

अर्थ

भगवान्‌ने पृथ्वीको ले जाकर जलके ऊपर व्यवहारयोग्य स्थानमें स्थित कर दिया और उसमें अपनी आधारशक्तिका संचार किया। उस समय हिरण्याक्षके सामने ही ब्रह्माजीने उनकी स्तुति की और देवताओंने फूल बरसाये॥ ८॥ तब श्रीहरिने बड़ी भारी गदा लिये अपने पीछे आ रहे हिरण्याक्षसे, जो सोनेके आभूषण और अद्भुत कवच धारण किये था तथा अपने कटुवाक्योंसे उन्हें निरन्तर मर्माहत कर रहा था, अत्यन्त क्रोधपूर्वक हँसते हुए कहा॥ ९॥ ✎ 274

यह व्याख्या श्लोक 3.18.8 से 3.18.9 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #274 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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