ityuktaḥ sa tadā bhūyastāḍayan vyanadad bhṛśam|| 10
अर्थ
साधुस्वभाव विदुरजी! यज्ञमूर्ति श्रीवराहभगवान्ने शत्रुके देखते-देखते लीलासे ही अपने बायें पैरसे उसकी वह वायुके समान वेगवाली गदा पृथ्वीपर गिरा दी और उससे कहा, ‘अरे दैत्य! तू मुझे जीतना चाहता है, इसलिये अपना शस्त्र उठा ले और एक बार फिर वार कर।’ भगवान्के इस प्रकार कहनेपर उसने फिर गदा चलायी और बड़ी भीषण गर्जना करने लगा॥ ९-१०॥✎ 282283284
यह अर्थ श्लोक 9–10 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
आह चायुधमाधत्स्व घटस्व त्वं जिगीषसि।
इत्युक्तः स तदा भूयस्ताडयन् व्यनदद् भृशम्॥ १०
साधुस्वभाव विदुरजी! यज्ञमूर्ति श्रीवराहभगवान्ने शत्रुके देखते-देखते लीलासे ही अपने बायें पैरसे उसकी वह वायुके समान वेगवाली गदा पृथ्वीपर गिरा दी और उससे कहा, ‘अरे दैत्य! तू मुझे जीतना चाहता है, इसलिये अपना शस्त्र उठा ले और एक बार फिर वार कर।’ भगवान्के इस प्रकार कहनेपर उसने फिर गदा चलायी और बड़ी भीषण गर्जना करने लगा॥ ९-१०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.19.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 325) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/19/10/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#282 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने, → भगवान्ने,
#283 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीवराहभगवान् ने → श्रीवराहभगवान्ने