श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.19.10

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

आह चायुधमाधत्स्व घटस्व त्वं जिगीषसि।

इत्युक्तः स तदा भूयस्ताडयन् व्यनदद् भृशम्॥ १०

āha cāyudhamādhatsva ghaṭasva tvaṃ jigīṣasi|

ityuktaḥ sa tadā bhūyastāḍayan vyanadad bhṛśam|| 10

अर्थ

साधुस्वभाव विदुरजी! यज्ञमूर्ति श्रीवराहभगवान्‌ने शत्रुके देखते-देखते लीलासे ही अपने बायें पैरसे उसकी वह वायुके समान वेगवाली गदा पृथ्वीपर गिरा दी और उससे कहा, ‘अरे दैत्य! तू मुझे जीतना चाहता है, इसलिये अपना शस्त्र उठा ले और एक बार फिर वार कर।’ भगवान्‌के इस प्रकार कहनेपर उसने फिर गदा चलायी और बड़ी भीषण गर्जना करने लगा॥ ९-१०॥✎ 282 283 284

यह अर्थ श्लोक 9–10 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #282 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने, → भगवान्‌ने,
  • #283 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीवराहभगवान् ने → श्रीवराहभगवान्‌ने
  • #284 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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