किंतु जिस प्रकार कोई ब्राह्मणके ऊपर निष्फल अभिचार (मारणादि प्रयोग) करे—मूठ आदि चलाये, वैसे ही उसने श्रीयज्ञपुरुषपर प्रहार करनेके लिये एक प्रज्वलित अग्निके समान लपलपाता हुआ त्रिशूल लिया॥ १३॥✎ 285
जग्राह त्रिशिखं शूलं ज्वलज्ज्वलनलोलुपम्।
यज्ञाय धृतरूपाय विप्रायाभिचरन् यथा॥ १३
किंतु जिस प्रकार कोई ब्राह्मणके ऊपर निष्फल अभिचार (मारणादि प्रयोग) करे—मूठ आदि चलाये, वैसे ही उसने श्रीयज्ञपुरुषपर प्रहार करनेके लिये एक प्रज्वलित अग्निके समान लपलपाता हुआ त्रिशूल लिया॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.19.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 325) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/19/13/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)