श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.19.25

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

तं मुष्टिभिर्विनिघ्नन्तं वज्रसारैरधोक्षजः।

करेण कर्णमूलेऽहन् यथा त्वाष्ट्रं मरुत्पतिः॥ २५

taṃ muṣṭibhirvinighnantaṃ vajrasārairadhokṣajaḥ|

kareṇa karṇamūle'han yathā tvāṣṭraṃ marutpatiḥ|| 25

अर्थ

अब वह भगवान्‌को वज्रके समान कठोर मुक्कोंसे मारने लगा। तब इन्द्रने जैसे वृत्रासुरपर प्रहार किया था, उसी प्रकार भगवान्‌ने उसकी कनपटीपर एक तमाचा मारा॥ २५॥✎ 286 287

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #286 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #287 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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