श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.19.26

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

स आहतो विश्‍वजिता ह्यवज्ञया

परिभ्रमद्गात्र उदस्तलोचनः।

विशीर्णबाह्वङ्‌घ्रिशिरोरुहोऽपतद्

यथा नगेन्द्रो लुलितो नभस्वता॥ २६

sa āhato viśvajitā hyavajñayā

paribhramadgātra udastalocanaḥ|

viśīrṇabāhvaṅghriśiroruho'patad

yathā nagendro lulito nabhasvatā|| 26

अर्थ

विश्‍वविजयी भगवान्‌ने यद्यपि बड़ी उपेक्षासे तमाचा मारा था, तो भी उसकी चोटसे हिरण्याक्षका शरीर घूमने लगा, उसके नेत्र बाहर निकल आये तथा हाथ-पैर और बाल छिन्‍न-भिन्‍न हो गये और वह निष्प्राण होकर आँधीसे उखड़े हुए विशाल वृक्षके समान पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ २६॥✎ 288

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #288 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें