श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.19.27

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

क्षितौ शयानं तमकुण्ठवर्चसं

करालदंष्ट्रं परिदष्टदच्छदम्।

अजादयो वीक्ष्य शशंसुरागता

अहो इमां को नु लभेत संस्थितिम्॥ २७

kṣitau śayānaṃ tamakuṇṭhavarcasaṃ

karāladaṃṣṭraṃ paridaṣṭadacchadam|

ajādayo vīkṣya śaśaṃsurāgatā

aho imāṃ ko nu labheta saṃsthitim|| 27

अर्थ

हिरण्याक्षका तेज अब भी मलिन नहीं हुआ था। उस कराल दाढ़ोंवाले दैत्यको दाँतोंसे होठ चबाते पृथ्वीपर पड़ा देख वहाँ युद्ध देखनेके लिये आये हुए ब्रह्मादि देवता उसकी प्रशंसा करने लगे कि ‘अहो! ऐसी अलभ्य मृत्यु किसको मिल सकती है॥ २७॥✎ 288

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #288 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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