अपनी मिथ्या उपाधिसे छूटनेके लिये जिनका योगिजन समाधियोगके द्वारा एकान्तमें ध्यान करते हैं, उन्हींके चरण-प्रहारसे उनका मुख देखते-देखते इस दैत्यराजने अपना शरीर त्यागा॥ २८॥✎ 288
यं योगिनो योगसमाधिना रहो
ध्यायन्ति लिंगादसतो मुमुक्षया।
तस्यैष दैत्यऋषभः पदाहतो
मुखं प्रपश्यंस्तनुमुत्ससर्ज ह॥ २८
अपनी मिथ्या उपाधिसे छूटनेके लिये जिनका योगिजन समाधियोगके द्वारा एकान्तमें ध्यान करते हैं, उन्हींके चरण-प्रहारसे उनका मुख देखते-देखते इस दैत्यराजने अपना शरीर त्यागा॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.19.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 327) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/19/28/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)