श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.19.37

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

यो वै हिरण्याक्षवधं महाद्भुतं

विक्रीडितं कारणसूकरात्मनः।

शृणोति गायत्यनुमोदतेऽञ्जसा

विमुच्यते१ ब्रह्मवधादपि द्विजाः२॥ ३७

yo vai hiraṇyākṣavadhaṃ mahādbhutaṃ

vikrīḍitaṃ kāraṇasūkarātmanaḥ|

śṛṇoti gāyatyanumodate'ñjasā

vimucyate brahmavadhādapi dvijāḥ|| 37

अर्थ

शौनकादि ऋषियो! पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये वराहरूप धारण करनेवाले श्रीहरिकी इस हिरण्याक्ष-वध नामक परम अद्भुत लीलाको जो पुरुष सुनता, गाता अथवा अनुमोदन करता है, वह ब्रह्महत्या-जैसे घोर पापसे भी सहजमें ही छूट जाता हैं॥ ३७॥✎ 289 290

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—स मुच्यते।

    (मुद्रित पृष्ठ 328)
  2. २

    प्रा० पा०—ध्रुवम्।

    (मुद्रित पृष्ठ 328)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #289 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #290 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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