श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.19.38

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

एतन्महापुण्यमलं३ पवित्रं

धन्यं यशस्यं पदमायुराशिषाम्।

प्राणेन्द्रियाणां युधि शौर्यवर्धनं

नारायणोऽन्ते गतिरङ्ग शृण्वताम्॥ ३८

etanmahāpuṇyamalaṃ pavitraṃ

dhanyaṃ yaśasyaṃ padamāyurāśiṣām|

prāṇendriyāṇāṃ yudhi śauryavardhanaṃ

nārāyaṇo'nte gatiraṅga śṛṇvatām|| 38

अर्थ

यह चरित्र अत्यन्त पुण्यप्रद परम पवित्र, धन और यशकी प्राप्ति करानेवाला आयुवर्द्धक और कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला तथा युद्धमें प्राण और इन्द्रियोंकी शक्ति बढ़ानेवाला है। जो लोग इसे सुनते हैं, उन्हें अन्तमें श्रीभगवान्‌का आश्रय प्राप्त होता है॥ ३८॥✎ 289 290

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे
हिरण्याक्षवधो नामैकोनविंशोऽध्यायः॥ १९॥

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—फलं।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 328)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #289 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #290 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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