श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.13

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

यद्धर्मसूनोर्बत राजसूये

निरीक्ष्य दृक्स्वस्त्ययनं त्रिलोकः।

कार्त्स्न्येन चाद्येह गतं विधातु-

रर्वाक्सृतौ कौशलमित्यमन्यत॥ १३

yaddharmasūnorbata rājasūye

nirīkṣya dṛksvastyayanaṃ trilokaḥ|

kārtsnyena cādyeha gataṃ vidhātu-

rarvāksṛtau kauśalamityamanyata|| 13

अर्थ

धर्मराज युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें जब भगवान्‌के उस नयनाभिराम रूपपर लोगोंकी दृष्टि पड़ी थी, तब त्रिलोकीने यही माना था कि मानव-सृष्टिकी रचनामें विधाताकी जितनी चतुराई है, सब इसी रूपमें पूरी हो गयी है॥ १३॥

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