धर्मराज युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें जब भगवान्के उस नयनाभिराम रूपपर लोगोंकी दृष्टि पड़ी थी, तब त्रिलोकीने यही माना था कि मानव-सृष्टिकी रचनामें विधाताकी जितनी चतुराई है, सब इसी रूपमें पूरी हो गयी है॥ १३॥
यद्धर्मसूनोर्बत राजसूये
निरीक्ष्य दृक्स्वस्त्ययनं त्रिलोकः।
कार्त्स्न्येन चाद्येह गतं विधातु-
रर्वाक्सृतौ कौशलमित्यमन्यत॥ १३
धर्मराज युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें जब भगवान्के उस नयनाभिराम रूपपर लोगोंकी दृष्टि पड़ी थी, तब त्रिलोकीने यही माना था कि मानव-सृष्टिकी रचनामें विधाताकी जितनी चतुराई है, सब इसी रूपमें पूरी हो गयी है॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.2.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 242) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/2/13/