श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.12

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

यन्मर्त्यलीलौपयिकं स्वयोग-

मायाबलं दर्शयता गृहीतम्।

विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः

परं पदं भूषणभूषणाङ्गम्॥ १२

yanmartyalīlaupayikaṃ svayoga-

māyābalaṃ darśayatā gṛhītam|

vismāpanaṃ svasya ca saubhagarddheḥ

paraṃ padaṃ bhūṣaṇabhūṣaṇāṅgam|| 12

अर्थ

भगवान्‌ने अपनी योगमायाका प्रभाव दिखानेके लिये मानवलीलाओंके योग्य जो दिव्य श्रीविग्रह प्रकट किया था, वह इतना सुन्दर था कि उसे देखकर सारा जगत् तो मोहित हो ही जाता था, वे स्वयं भी विस्मित हो जाते थे। सौभाग्य और सुन्दरताकी पराकाष्ठा थी उस रूपमें। उससे आभूषण (अंगोंके गहने) भी विभूषित हो जाते थे॥ १२॥✎ 191 192

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #191 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #192 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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