श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.11

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

प्रदर्श्यातप्ततपसामवितृप्तदृशां नृणाम्।

आदायान्तरधाद्यस्तु स्वबिम्बं लोकलोचनम्॥ ११

pradarśyātaptatapasāmavitṛptadṛśāṃ nṛṇām|

ādāyāntaradhādyastu svabimbaṃ lokalocanam|| 11

अर्थ

जिन्होंने कभी तप नहीं किया, उन लोगोंको भी इतने दिनोंतक दर्शन देकर अब उनकी दर्शन-लालसाको तृप्त किये बिना ही वे भगवान् श्रीकृष्ण अपने त्रिभुवन-मोहन श्रीविग्रहको छिपाकर अन्तर्धान हो गये हैं और इस प्रकार उन्होंने मानो उनके नेत्रोंको ही छीन लिया है॥ ११॥✎ 191 192

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #191 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #192 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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