श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.10

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

देवस्य मायया स्पृष्टा ये चान्यदसदाश्रिताः।

भ्राम्यते धीर्न तद्वाक्यैरात्मन्युप्तात्मनो हरौ॥ १०

devasya māyayā spṛṣṭā ye cānyadasadāśritāḥ|

bhrāmyate dhīrna tadvākyairātmanyuptātmano harau|| 10

अर्थ

किंतु भगवान्‌की मायासे मोहित इन यादवों और इनसे व्यर्थका वैर ठाननेवाले शिशुपाल आदिके अवहेलना और निन्दासूचक वाक्योंसे भगवत्प्राण महानुभावोंकी बुद्धि भ्रममें नहीं पड़ती थी॥ १०॥✎ 191 192

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #191 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #192 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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