॥ श्रीहरिः ॥
देवस्य मायया स्पृष्टा ये चान्यदसदाश्रिताः।
भ्राम्यते धीर्न तद्वाक्यैरात्मन्युप्तात्मनो हरौ॥ १०
devasya māyayā spṛṣṭā ye cānyadasadāśritāḥ|
bhrāmyate dhīrna tadvākyairātmanyuptātmano harau|| 10
अर्थ
किंतु भगवान्की मायासे मोहित इन यादवों और इनसे व्यर्थका वैर ठाननेवाले शिशुपाल आदिके अवहेलना और निन्दासूचक वाक्योंसे भगवत्प्राण महानुभावोंकी बुद्धि भ्रममें नहीं पड़ती थी॥ १०॥✎ 191 192
देवस्य मायया स्पृष्टा ये चान्यदसदाश्रिताः।
भ्राम्यते धीर्न तद्वाक्यैरात्मन्युप्तात्मनो हरौ॥ १०
किंतु भगवान्की मायासे मोहित इन यादवों और इनसे व्यर्थका वैर ठाननेवाले शिशुपाल आदिके अवहेलना और निन्दासूचक वाक्योंसे भगवत्प्राण महानुभावोंकी बुद्धि भ्रममें नहीं पड़ती थी॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.2.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 242) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/2/10/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #191 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्ने
- #192 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की