यादवलोग मनके भावको ताड़नेवाले, बड़े समझदार और भगवान्के साथ एक ही स्थानमें रहकर क्रीडा करनेवाले थे; तो भी उन सबने समस्त विश्वके आश्रय, सर्वान्तर्यामी श्रीकृष्णको एक श्रेष्ठ यादव ही समझा॥ ९॥✎ 191192
इङ्गितज्ञाः पुरुप्रौढा एकारामाश्च सात्वताः।
सात्वतामृषभं सर्वे भूतावासममंसत॥ ९
यादवलोग मनके भावको ताड़नेवाले, बड़े समझदार और भगवान्के साथ एक ही स्थानमें रहकर क्रीडा करनेवाले थे; तो भी उन सबने समस्त विश्वके आश्रय, सर्वान्तर्यामी श्रीकृष्णको एक श्रेष्ठ यादव ही समझा॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.2.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 242) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/2/9/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)