श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.16

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

मां खेदयत्येतदजस्य जन्म-

विडम्बनं यद्वसुदेवगेहे।

व्रजे च वासोऽरिभयादिव स्वयं

पुराद् व्यवात्सीद्यदनन्तवीर्यः॥ १६

māṃ khedayatyetadajasya janma-

viḍambanaṃ yadvasudevagehe|

vraje ca vāso'ribhayādiva svayaṃ

purād vyavātsīdyadanantavīryaḥ|| 16

अर्थ

अजन्मा होकर भी वसुदेवजीके यहाँ जन्म लेनेकी लीला करना, सबको अभय देनेवाले होनेपर भी मानो कंसके भयसे व्रजमें जाकर छिप रहना और अनन्तपराक्रमी होनेपर भी कालयवनके सामने मथुरापुरीको छोड़कर भाग जाना—भगवान्‌की ये लीलाएँ याद आ-आकर मुझे बेचैन कर डालती हैं॥ १६॥✎ 194 1297 1298

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #194 शब्दोंके बीचका स्थान: जाना—भगवान् की → जाना—भगवान्‌की
  • #1297 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): भु्रकुटिविलाससे → भु्रुकुटिविलाससे
  • #1298 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): भु्रुकुटिविलाससे → भ्रुकुटिविलाससे

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