श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.17

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

दुनोति चेतः स्मरतो ममैतद्

यदाह पादावभिवन्द्य पित्रोः।

ताताम्ब कंसादुरुशङ्कितानां

प्रसीदतं नोऽकृतनिष्कृतीनाम्॥ १७

dunoti cetaḥ smarato mamaitad

yadāha pādāvabhivandya pitroḥ|

tātāmba kaṃsāduruśaṅkitānāṃ

prasīdataṃ no'kṛtaniṣkṛtīnām|| 17

अर्थ

उन्होंने जो देवकी-वसुदेवकी चरण-वन्दना करके कहा था—‘पिताजी, माताजी! कंसका बड़ा भय रहनेके कारण मुझसे आपकी कोई सेवा न बन सकी, आप मेरे इस अपराधपर ध्यान न देकर मुझपर प्रसन्‍न हों।’ श्रीकृष्णकी ये बातें जब याद आती हैं, तब आज भी मेरा चित्त अत्यन्त व्यथित हो जाता है॥ १७॥✎ 194 1297 1298

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #194 शब्दोंके बीचका स्थान: जाना—भगवान् की → जाना—भगवान्‌की
  • #1297 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): भु्रकुटिविलाससे → भु्रुकुटिविलाससे
  • #1298 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): भु्रुकुटिविलाससे → भ्रुकुटिविलाससे

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