श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.22

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

तत्तस्य कैङ्कर्यमलं भृतान्‍नो

विग्लापयत्यङ्ग यदुग्रसेनम्।

तिष्ठन्‍निषण्णं परमेष्ठिधिष्ण्ये

न्यबोधयद्देव निधारयेति॥ २२

tattasya kaiṅkaryamalaṃ bhṛtānno

viglāpayatyaṅga yadugrasenam|

tiṣṭhanniṣaṇṇaṃ parameṣṭhidhiṣṇye

nyabodhayaddeva nidhārayeti|| 22

अर्थ

विदुरजी! वे ही भगवान् श्रीकृष्ण राजसिंहासनपर बैठे हुए उग्रसेनके सामने खड़े होकर निवेदन करते थे, ‘देव! हमारी प्रार्थना सुनिये।’ उनके इस सेवा-भावकी याद आते ही हम-जैसे सेवकोंका चित्त अत्यन्त व्यथित हो जाता है॥ २२॥✎ 195

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #195 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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