श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.21

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

स्वयं त्वसाम्यातिशयस्त्र्यधीशः

स्वा१राज्यलक्ष्म्याप्तसमस्तकामः ।

बलिं हरद्भिश्चिरलोकपालैः

किरीटकोट्येडितपादपीठः ॥ २१

svayaṃ tvasāmyātiśayastryadhīśaḥ

svārājyalakṣmyāptasamastakāmaḥ |

baliṃ haradbhiściralokapālaiḥ

kirīṭakoṭyeḍitapādapīṭhaḥ || 21

अर्थ

स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण तीनों लोकोंके अधीश्‍वर हैं। उनके समान भी कोई नहीं है, उनसे बढ़कर तो कौन होगा। वे अपने स्वतःसिद्ध ऐश्‍वर्यसे ही सर्वदा पूर्णकाम हैं। इन्द्रादि असंख्य लोकपालगण नाना प्रकारकी भेंटें ला-लाकर अपने-अपने मुकुटोंके अग्रभागसे उनके चरण रखनेकी चौकीको प्रणाम किया करते हैं॥ २१॥✎ 195

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—साम्राज्य०।

    (मुद्रित पृष्ठ 244)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #195 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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