॥ श्रीहरिः ॥
अयाजयद्गोसवेन गोपराजं द्विजोत्तमैः।
वित्तस्य चोरुभारस्य चिकीर्षन् सद्व्ययं विभुः॥ ३२
ayājayadgosavena goparājaṃ dvijottamaiḥ|
vittasya corubhārasya cikīrṣan sadvyayaṃ vibhuḥ|| 32
अर्थ
भगवान् श्रीकृष्णने बढ़े हुए धनका सद्व्यय करानेकी इच्छासे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके द्वारा नन्दबाबासे गोवर्धनपूजारूप गोयज्ञ करवाया॥ ३२॥✎ 197 198 199
अयाजयद्गोसवेन गोपराजं द्विजोत्तमैः।
वित्तस्य चोरुभारस्य चिकीर्षन् सद्व्ययं विभुः॥ ३२
भगवान् श्रीकृष्णने बढ़े हुए धनका सद्व्यय करानेकी इच्छासे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके द्वारा नन्दबाबासे गोवर्धनपूजारूप गोयज्ञ करवाया॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.2.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 245) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/2/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
- #197 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्ने
- #198 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्ने
- #199 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्ने