भद्र! इससे अपना मानभंग होनेके कारण जब इन्द्रने क्रोधित होकर व्रजका विनाश करनेके लिये मूसलधार जल बरसाना आरम्भ किया, तब भगवान्ने करुणावश खेल-ही-खेलमें छत्तेके समान गोवर्धन पर्वतको उठा लिया और अत्यन्त घबराये हुए व्रजवासियोंकी तथा उनके पशुओंकी रक्षा की॥ ३३॥✎ 197198199
वर्षतीन्द्रे व्रजः कोपाद्भग्नमानेऽतिविह्वलः।
गोत्रलीलातपत्रेण त्रातो भद्रानुगृह्णता॥ ३३
भद्र! इससे अपना मानभंग होनेके कारण जब इन्द्रने क्रोधित होकर व्रजका विनाश करनेके लिये मूसलधार जल बरसाना आरम्भ किया, तब भगवान्ने करुणावश खेल-ही-खेलमें छत्तेके समान गोवर्धन पर्वतको उठा लिया और अत्यन्त घबराये हुए व्रजवासियोंकी तथा उनके पशुओंकी रक्षा की॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.2.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 245) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/2/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)