॥ श्रीहरिः ॥
दैवेन दुर्वितर्क्येण परेणानिमिषेण च।
जातक्षोभाद्भगवतो महानासीद् गुणत्रयात्॥ १२
daivena durvitarkyeṇa pareṇānimiṣeṇa ca|
jātakṣobhādbhagavato mahānāsīd guṇatrayāt|| 12
अर्थ
श्रीमैत्रेयजीने कहा—विदुरजी! जिसकी गतिको जानना अत्यन्त कठिन है—उस जीवोंके प्रारब्ध, प्रकृतिके नियन्ता पुरुष और काल—इन तीन हेतुओंसे तथा भगवान्की सन्निधिसे त्रिगुणमय प्रकृतिमें क्षोभ होनेपर उससे महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ॥ १२॥✎ 293 294 295
दैवेन दुर्वितर्क्येण परेणानिमिषेण च।
जातक्षोभाद्भगवतो महानासीद् गुणत्रयात्॥ १२
श्रीमैत्रेयजीने कहा—विदुरजी! जिसकी गतिको जानना अत्यन्त कठिन है—उस जीवोंके प्रारब्ध, प्रकृतिके नियन्ता पुरुष और काल—इन तीन हेतुओंसे तथा भगवान्की सन्निधिसे त्रिगुणमय प्रकृतिमें क्षोभ होनेपर उससे महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.20.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 330) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/20/12/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
- #293 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने
- #294 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #295 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की