श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.20.12

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

दैवेन दुर्वितर्क्येण परेणानिमिषेण च।

जातक्षोभाद्भगवतो महानासीद् गुणत्रयात्॥ १२

daivena durvitarkyeṇa pareṇānimiṣeṇa ca|

jātakṣobhādbhagavato mahānāsīd guṇatrayāt|| 12

अर्थ

श्रीमैत्रेयजीने कहा—विदुरजी! जिसकी गतिको जानना अत्यन्त कठिन है—उस जीवोंके प्रारब्ध, प्रकृतिके नियन्ता पुरुष और काल—इन तीन हेतुओंसे तथा भगवान्‌की सन्‍निधिसे त्रिगुणमय प्रकृतिमें क्षोभ होनेपर उससे महत्तत्त्व उत्पन्‍न हुआ॥ १२॥✎ 293 294 295

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #293 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने
  • #294 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #295 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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