दैवकी प्रेरणासे रजःप्रधान महत्तत्त्वसे वैकारिक (सात्त्विक), राजस और तामस—तीन प्रकारका अहङ्कार उत्पन्न हुआ। उसने आकाशादि पाँच-पाँच तत्त्वोंके अनेक वर्ग* प्रकट किये॥ १३॥✎ 293294295
रजःप्रधानान्महतस्त्रिलिंगो दैवचोदितात्।
जातः ससर्ज भूतादिर्वियदादीनि पंचशः॥ १३
दैवकी प्रेरणासे रजःप्रधान महत्तत्त्वसे वैकारिक (सात्त्विक), राजस और तामस—तीन प्रकारका अहङ्कार उत्पन्न हुआ। उसने आकाशादि पाँच-पाँच तत्त्वोंके अनेक वर्ग प्रकट किये॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.20.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 330) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/20/13/
टिप्पणियाँ
२
प्रा० पा०—भूतानि विय०।
(मुद्रित पृष्ठ 330)
*
पंच तन्मात्र, पंच महाभूत, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और उनके पाँच-पाँच देवता—इन्हीं छः वर्गोंका यहाँ संकेत समझना चाहिये।
(मुद्रित पृष्ठ 330)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#293 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने