वे सब अलग-अलग रहकर भूतोंके कार्यरूप ब्रह्माण्डकी रचना नहीं कर सकते थे; इसलिये उन्होंने भगवान्की शक्तिसे परस्पर संगठित होकर एक सुवर्णवर्ण अण्डकी रचना की॥ १४॥✎ 293294295
तानि चैकैकशः स्रष्टुमसमर्थानि भौतिकम्।
संहत्य दैवयोगेन हैममण्डमवासृजन्॥ १४
वे सब अलग-अलग रहकर भूतोंके कार्यरूप ब्रह्माण्डकी रचना नहीं कर सकते थे; इसलिये उन्होंने भगवान्की शक्तिसे परस्पर संगठित होकर एक सुवर्णवर्ण अण्डकी रचना की॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.20.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 330) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/20/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#293 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने