श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.20.28

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

सोऽवधार्यास्य कार्पण्यं विविक्ताध्यात्मदर्शनः।

विमुञ्चात्मतनुं घोरामित्युक्तो विमुमोच ह॥ २८

so'vadhāryāsya kārpaṇyaṃ viviktādhyātmadarśanaḥ|

vimuñcātmatanuṃ ghorāmityukto vimumoca ha|| 28

अर्थ

प्रभु तो प्रत्यक्षवत् सबके हृदयकी जाननेवाले हैं। उन्होंने ब्रह्माजीकी आतुरता देखकर कहा—‘तुम अपने इस कामकलुषित शरीरको त्याग दो।’ भगवान्‌के यों कहते ही उन्होंने वह शरीर भी छोड़ दिया॥ २८॥

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