श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.20.29

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

तां क्‍वणच्चरणाम्भोजां मदविह्वललोचनाम्।

कांचीकलापविलसद्दुकूलच्छन्‍नरोधसम् ॥ २९

tāṃ kvaṇaccaraṇāmbhojāṃ madavihvalalocanām|

kāṃcīkalāpavilasaddukūlacchannarodhasam || 29

अर्थ

(ब्रह्माजीका छोड़ा हुआ वह शरीर एक सुन्दरी स्त्री—संध्यादेवीके रूपमें परिणत हो गया।) उसके चरणकमलोंके पायजेब झंकृत हो रहे थे। उसकी आँखें मतवाली हो रही थीं और कमर करधनीकी लड़ोंसे सुशोभित सजीली साड़ीसे ढकी हुई थी॥ २९॥

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