श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.20.41

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

जगृहुस्तद्विसृष्टां तां जृम्भणाख्यां तनुं प्रभोः।

निद्रामिन्द्रियविक्लेदो यया भूतेषु दृश्यते।

येनोच्छिष्टान्धर्षयन्ति तमुन्मादं प्रचक्षते॥ ४१

jagṛhustadvisṛṣṭāṃ tāṃ jṛmbhaṇākhyāṃ tanuṃ prabhoḥ|

nidrāmindriyavikledo yayā bhūteṣu dṛśyate|

yenocchiṣṭāndharṣayanti tamunmādaṃ pracakṣate|| 41

अर्थ

ब्रह्माजीके त्यागे हुए उस जँभाईरूप शरीरको भूत-पिशाचोंने ग्रहण किया। इसीको निद्रा भी कहते हैं, जिससे जीवोंकी इन्द्रियोंमें शिथिलता आती देखी जाती है। यदि कोई मनुष्य जूठे मुँह सो जाता है तो उसपर भूत-पिशाचादि आक्रमण करते हैं; उसीको उन्माद कहते हैं॥ ४१॥

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