ब्रह्माजीके त्यागे हुए उस जँभाईरूप शरीरको भूत-पिशाचोंने ग्रहण किया। इसीको निद्रा भी कहते हैं, जिससे जीवोंकी इन्द्रियोंमें शिथिलता आती देखी जाती है। यदि कोई मनुष्य जूठे मुँह सो जाता है तो उसपर भूत-पिशाचादि आक्रमण करते हैं; उसीको उन्माद कहते हैं॥ ४१॥
जगृहुस्तद्विसृष्टां तां जृम्भणाख्यां तनुं प्रभोः।
निद्रामिन्द्रियविक्लेदो यया भूतेषु दृश्यते।
येनोच्छिष्टान्धर्षयन्ति तमुन्मादं प्रचक्षते॥ ४१
ब्रह्माजीके त्यागे हुए उस जँभाईरूप शरीरको भूत-पिशाचोंने ग्रहण किया। इसीको निद्रा भी कहते हैं, जिससे जीवोंकी इन्द्रियोंमें शिथिलता आती देखी जाती है। यदि कोई मनुष्य जूठे मुँह सो जाता है तो उसपर भूत-पिशाचादि आक्रमण करते हैं; उसीको उन्माद कहते हैं॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.20.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 333) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/20/41/