श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.20.42

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

ऊर्जस्वन्तं मन्यमान आत्मानं भगवानजः।

साध्यान् गणान् पितृगणान् परोक्षेणासृजत्प्रभुः॥ ४२

ūrjasvantaṃ manyamāna ātmānaṃ bhagavānajaḥ|

sādhyān gaṇān pitṛgaṇān parokṣeṇāsṛjatprabhuḥ|| 42

अर्थ

फिर भगवान् ब्रह्माने भावना की कि मैं तेजोमय हूँ और अपने अदृश्य रूपसे साध्यगण एवं पितृगणको उत्पन्‍न किया॥ ४२॥

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